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Friday, July 5, 2013

चाँद

आज रात चाँद को देखा 
इमारतों से ढकी हुई थी 
जमीं से तो दिखती नहीं 
सो हमने छत पे चढ़ के देखा । 

हलके बादलों से धुन्द्लाते 
चाँद को देखा । 

ना जाने कितने देर 
बादलो  से ढकी रही 
पर बादल तो बदलते हैं 
तब जा के मैंने चाँद को देखा 

नजरे मिलाते ही फिर से 
बाद्लों   के पीछे 
छुप  जाते देखा । 

और जैसे सिर्फ मेरे लिये 
हवा को  चाँद से बाद्लों  को दूर करते देखा । 

अब ये पेड़ 
जो मेरे छत से ऊपर बढ़ गया है 
चाँद को अपनी टहनियों और 
पत्तों  से छुपा रहा है

पर मैंने 
हवाओं  को 
टहनियों से 
अटखेलियाँ कर , झकझोर कर 
उन्हें दूर करते देखा ।  

फिर बादल ने 
जैसे अपने घर मे 
क़ैद कर लिया उसे 
काली  घटाओ से ,
पूरे आकाश मे डेरा जमा लिया । 

पर आज बादल छट चुके हैं 
और आसमाँ साफ़  है 
चाँदनी  से ये छत सफ़ेद है 
बस इक कमरे की दीवार ने 
और मेरी परछाई  ने 
अँधेरा किया हुआ है. 

5 comments:

expression said...

अँधेरा छंटता ही होगा...चाँद हौले से भीतर आता ही होगा.....
:-)
अनु

harshraj said...

ky bat hai.... ultimate..

ashu said...

superb..keep on going :))

Ritu Raj Verma said...

gr8 thought running with each lines, loved it.awsm!!!

Kailash Sharma said...

बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना...